30 साल से जोती जा रही जमीन पर प्रशासन का बुलडोज़र खतरा—7 दिन में खेत खाली करने का अल्टीमेटम, किसान परिवार रो-रोकर परेशान

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खरगोन | एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

तहसील महेश्वर के ग्राम कवड़िया में एक गरीब किसान परिवार पर प्रशासनिक सख्ती का पहाड़ टूट पड़ा है। विक्रम के बेटे अनिल (24 वर्ष) और उसका परिवार लगभग तीन दशक से जिस जमीन को अपनी मेहनत और पसीने से उपजाऊ बनाता आया, उसी जमीन को अब प्रशासन ने सरकारी मद भूमि घोषित कर दिया है और उस पर से अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी कर दिया है।

10 अक्टूबर 2025 को जारी सूचना पत्र में तहसीलदार महेश्वर ने भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 38 के तहत किसान को 0.400 हेक्टेयर जमीन खाली करने, 2000 रुपये अर्थदंड चुकाने और 7 दिनों के भीतर खेत खाली करने का निर्देश दिया है।

परिवार और ग्रामीणों में इस आदेश को लेकर भारी आक्रोश और दहशत है।

नोटिस जारी: 7 दिन में अतिक्रमण हटाओ… वरना प्रशासन खुद हटाएगा, खर्च भी तुमसे ही वसूलेगा

सूचना पत्र में साफ लिखा है कि—

भूमि खसरा नंबर 367/1/1/4

कुल रकबा 2.971 हेक्टेयर

इसमें से 0.400 हेक्टेयर को अतिक्रमित बताया गया

7 दिन के भीतर खुद हटाओ, अन्यथा

प्रशासन जेसीबी, पुलिस बल के साथ पहुंचकर अतिक्रमण हटाएगा

पूरा खर्च किसान से भू-राजस्व के रूप में वसूला जाएगा

तहसीलदार कार्यालय ने पुलिस, राजस्व निरीक्षक और पटवारी को भी कार्रवाई के लिए तैयार रहने के निर्देश दे दिए हैं। इसका मतलब है कि प्रशासन की ओर से कड़ी कार्रवाई की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

जेसीबी से खेत खोदने की धमकी—“नहीं हटे तो सब तोड़ दिए जाएंगे”

शिकायतकर्ता अनिल का आरोप है कि खेत खाली कराने आए कुछ लोग खुलकर धमकी दे रहे हैं—

“अगर तुमने खेत नहीं छोड़ा तो JCB से पूरा खेत खोद देंगे… घर-द्वार सब तोड़ दिए जाएंगे।”

इन धमकियों ने परिवार को अंदर तक हिला दिया है। खेत ही उनकी दुनिया है—इसी से:

बच्चों के स्कूल की फीस

घर का खर्च

अनाज

दवा-दारी

परिवार की रोज़ी-रोटी

सब चलता है।

“30 साल से इस जमीन पर खेती कर रहे हैं… आज अचानक कैसे सरकार की हो गई?”

अनिल ने पीड़ा भरे स्वर में कहा—

“करीब 30 साल से हम इस जमीन पर खेती कर रहे हैं। हमारे पिता और दादा भी यहीं खेती करते आए हैं।”

“अगर जमीन सरकारी थी तो इतने साल किसी ने क्यों नहीं बताया?”

“आज अचानक नोटिस देकर हमारी जिंदगी उखाड़ दी जा रही है।”

ग्रामीणों का कहना है कि परिवार ने सालों से इस जमीन पर मेहनत की है। खेतों को उपजाऊ बनाया, सिंचाई की व्यवस्था की और परिवार चलाया।

अब अचानक नोटिस आने से पूरा गाँव सदमे में है।

किसान की व्यथा—“खेती छिनी तो हम सड़क पर आ जाएंगे, भूखे मर जाएंगे”

अनिल का बयान पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है। उसने कहा—

“हमारा पूरा घर खेती पर निर्भर है।”

“हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं, घर का पूरा खर्च इसी से चलता है।”

“अगर खेती छीन ली गई तो हम सड़क पर आ जाएंगे।”

“हमारे पास कोई दूसरा रोजगार नहीं है। हम कहाँ जाएंगे? क्या करेंगे?”

परिवार का दावा है कि वे किसी तरह का झगड़ा नहीं चाहते। वे सिर्फ चाहते हैं कि—

या तो उनकी जमीन का कब्जा न छीना जाए

या उन्हें कोई पुनर्वास, विकल्प या रोजगार दिया जाए

“हमारी जमीन ही हमारी जिंदगी है… इसे छीना तो हम मर जाएंगे”—परिवार का भावुक बयान

इसी भय और दर्द के बीच परिवार का सबसे भावुक बयान सामने आया—

“हमारे लिए यह जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, यह हमारी जिंदगी है।”

“अगर यह जमीन हमसे गई तो हम मर जाएंगे। हम इतने गरीब हैं कि दूसरा रोजगार करना भी संभव नहीं।”

“बच्चों का भविष्य इसी खेत से जुड़ा है। इसे छोड़ना हमारी मौत जैसा है।”

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन का निर्णय बेहद कठोर है और बिना सुनवाई के किसी गरीब परिवार को उजाड़ देना अन्याय है।

प्रशासन एक्शन मोड में—पुलिस बल तैनात करने के निर्देश, बुलडोज़र की दस्तक कभी भी

जारी प्रतिलिपियों के अनुसार—

राजस्व निरीक्षक को कार्रवाई का नेतृत्व सौंपा गया

महिला पुलिस सहित पूरा पुलिस बल उपलब्ध कराने का निर्देश

पटवारी को रिकॉर्ड लेकर मौके पर उपस्थित होने के आदेश

अतिक्रमण न हटाने पर प्रशासन जेसीबी लेकर पहुंचेगा

गाँव में यह चर्चा तेज है कि कार्रवाई किसी भी दिन शुरू हो सकती है। बच्चे तक हर आवाज़ पर सहम जाते हैं।

क्या 30 साल का कब्जा कुछ नहीं? विशेषज्ञों ने उठाए सवाल

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि—

दशकों पुराने कब्जे में

पुनर्वास, मुआवज़ा, और सुनवाई

किसान की आजीविका

को प्राथमिकता देना चाहिए।

कई ग्रामीण मामलों में अदालतों ने ऐसे परिवारों को संरक्षण दिया है, लेकिन यहाँ नोटिस में सुनवाई का कोई उल्लेख नहीं है।

7 दिन की उलटी गिनती—किसान की जिंदगी और किस्मत एक आदेश पर टिकी

परिवार के पास अब सिर्फ 7 दिन हैं।
इसके बाद—

जेसीबी

पुलिस

राजस्व टीम

साइट पर पहुँचकर जमीन खाली करवा सकती है।

यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब किसानों का संघर्ष दिखाता है जो वर्षों की मेहनत के बावजूद असुरक्षा और भय में जीते हैं।

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