धमाल सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। अजय देवगन और अरशद-जावेद की टोली लोगों को हंसाने में कितना कामयाब रही है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
बॉलीवुड में इन दिनों सीक्वल और पुरानी हिट फ्रैंचाइजी की एक नई बहार आई हुई है। निर्माता-निर्देशक दर्शकों के बीच पहले से स्थापित हो चुके ब्रैंड्स का भरपूर फायदा उठाने की होड़ में लगे हैं। जब बात बिना सिर-पैर की और सिचुएशनल लाउड कॉमेडी की आती है तो साल 2007 में आई ‘धमाल’ का नाम सबसे पहले जेहन में उभरता है। इस सफर को आगे बढ़ाते हुए निर्देशक इंद्र कुमार इसकी चौथी कड़ी ‘धमाल 4’ लेकर सिनेमाघरों में हाजिर हो चुके हैं। यदि आप इस वीकेंड पर अपने पूरे परिवार के साथ कुछ ऐसा देखने की योजना बना रहे हैं, जिसमें आपको गहरा लॉजिक न ढूंढना पड़े और केवल हल्की-फुल्की हंसी-मजाक से आपका काम चल जाए, तो यह फिल्म आपके लिए एक सही विकल्प हो सकती है, लेकिन क्या यह फिल्म अपनी पिछली कड़ियों की तरह दर्शकों को लोटपोट करने में पूरी तरह सफल हो पाती है या फिर यह सिर्फ एक पुराना फॉर्मूला दोबारा दोहराने की कोशिश बनकर रह गई है, आइए इस विस्तृत और निष्पक्ष समीक्षा के माध्यम से समझते हैं।
एक चिर-परिचित शुरुआत और कहानी का ताना-बाना
फिल्म ‘धमाल’ की कहानी का मूल आधार एक बार फिर वही पुराना और आजमाया हुआ फॉर्मूला है, जिसे हम इस फ्रैंचाइजी की लगभग हर फिल्म में देखते आ रहे हैं। कहानी घूमती है एक सदी पुराने छिपे हुए खजाने के इर्द-गिर्द, जिसे पाने के लिए कई सारे लालची और दिमाग से थोड़े पैदल किरदार एक साथ रेस में शामिल हो जाते हैं। इस बार खजाने का राज एक रहस्यमयी द्वीप पर छिपा हुआ है, जहां पहुंचने का नक्शा या सुराग एक खास किरदार पृथ्वी (उपेंद्र लिमये) की याददाश्त में कैद है। लेकिन मुसीबत तब खड़ी होती है जब यह सुराग केवल किसी एक शख्स के हाथ नहीं लगता, बल्कि अलग-अलग टोलियों के कान में इसकी भनक पड़ जाती है।
कहानी में इस बार तीन मुख्य टोलियां बनाई गई हैं, जो एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगी हुई हैं। पहली टोली में गुड्डू (अजय देवगन) है, जो दो बच्चों की मां आलिया (ईशा गुप्ता) से शादी करने का सपना देख रहा है और उसके साथ उसका वफादार साथी जॉनी (संजय मिश्रा) खड़ा है। दूसरी टोली में हमारे पुराने और सदाबहार भाई आदि (अरशद वारसी) और मानव (जावेद जाफरी) हैं, जिनके साथ इस बार आदी की पत्नी (संजीदा शेख) भी इस पागलपन का हिस्सा बनी हैं। तीसरी टोली में किस्मत का मारा लल्लन (रितेश देशमुख) है, जो एक अमीर लड़की से शादी करके अपनी जिंदगी संवारना चाहता था, मगर उसके पल्ले पारो (अंजलि आनंद) पड़ जाती है। इन सब इंसानी टोलियों के बीच एंट्री होती है एक बेहद अजीबोगरीब और सनकी समुद्री लुटेरे अधूरा (रवि किशन) की, जो इस खजाने को किसी भी कीमत पर हथियाना चाहता है। इसके बाद शुरू होती है एक अनजान और खतरनाक द्वीप की तरफ भागने की अंधी दौड़, जहां मगरमच्छ, सांप, गहरी खाइयां और समुद्री तूफान इन सभी किरदारों का स्वागत करते हैं।
पुराने दिग्गजों की जुगलबंदी और नए चेहरों का तड़का
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) और ताकत इसकी भारी-भरकम और अनुभवी स्टार कास्ट है। अजय देवगन ने एक बार फिर कॉमेडी जॉनर में अपनी सहज उपस्थिति दर्ज कराई है। वह इस पागलपन से भरी भीड़ के बीच एक एंकर या कहें कि संतुलन बनाने वाले किरदार के रूप में नजर आते हैं। जब वह स्क्रीन पर गंभीर चेहरा बनाकर अजीबो-गरीब हरकतें करते हैं, तो वह दृश्य अपने आप मजेदार बन जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, अरशद वारसी और जावेद जाफरी की सदाबहार जोड़ी इस फिल्म की असली रीढ़ की हड्डी है। इन दोनों का आपसी तालमेल और कॉमिक टाइमिंग आज भी उतनी ही फ्रेश और कमाल की लगती है जितनी पहले भाग में थी। खासकर जावेद जाफरी का मासूमियत भरा अंदाज और उनकी वजह से संजीदा शेख का बार-बार चोटिल होना दर्शकों को खूब गुदगुदाता है।
रितेश देशमुख ने अपने देसी अंदाज से लल्लन के किरदार में जान फूंकने की पूरी कोशिश की है, हालांकि कुछ जगहों पर उनका अभिनय थोड़ा लाउड महसूस होता है। इस फिल्म में सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज बनकर उभरते हैं रवि किशन और अंजलि आनंद। रवि किशन ने एक सनकी विलेन और समुद्री डाकू के रूप में अपनी संवाद अदायगी और हाव-भाव से बेहतरीन समां बांधा है। इस साल वे लगातार अपने किरदारों से चौंका रहे हैं और यह फिल्म भी उसका अपवाद नहीं है। वहीं रितेश की पत्नी के रोल में अंजलि आनंद ने गजब की कॉमिक टाइमिंग दिखाई है, उनका स्क्रीन प्रेजेंस बेहद लाजवाब है और वह भावुक दृश्यों में भी उतनी ही प्रामाणिक लगी हैं। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अपने वन-लाइनर्स और ब्रो-मांस वाले दृश्यों से हंसाने में कामयाब रहते हैं। ईशा गुप्ता, संजीदा शेख और बृजेंद्र काला को स्क्रीन स्पेस भले ही सीमित मिला हो, लेकिन उन्होंने अपनी उपस्थिति को सार्थक किया है।
इंद्र कुमार का पुराना मगर सुरक्षित दांव
निर्देशक इंद्र कुमार को भारतीय सिनेमा में सिचुएशनल और लाउड कॉमेडी फिल्मों का उस्ताद माना जाता है। इस फिल्म में भी उनका निर्देशन पूरी तरह से दर्शकों को बिना दिमाग लगाए मनोरंजन परोसने पर केंद्रित है। उन्होंने फिल्म के पहले हाफ को इतनी तेज रफ्तार से बुना है कि दर्शकों को यह सोचने का मौका ही नहीं मिलता कि स्क्रीन पर जो हो रहा है उसका कोई तर्क है या नहीं। इंद्र कुमार ने फिल्म के भीतर खुद की ही पुरानी फिल्मों और ‘धमाल’ फ्रैंचाइजी के पुराने सीन्स का बखूबी रेफरेंस इस्तेमाल किया है, जो इस फ्रैंचाइजी के पुराने फैंस के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने का काम करता है।
इंद्र कुमार की सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्होंने फिल्म की टोन को पूरी तरह से पारिवारिक बनाए रखा। उन्होंने एडल्ट ह्यूमर की जगह सिचुएशनल और फिजिकल कॉमेडी को प्राथमिकता दी, ताकि बच्चे भी इसका पूरा आनंद ले सकें। फिल्म के आखिरी हिस्से में उन्होंने कहानी को एक भावनात्मक मोड़ देने की कोशिश की है, जो ‘पंचतंत्र’ की कहानियों जैसा नैतिक संदेश देता है कि लालच बुरी बला है और अपनों का साथ सबसे बढ़कर है। एक निर्देशक के तौर पर वे अपनी टारगेट ऑडियंस (विशेषकर बच्चों और परिवारों) को थियेटर तक खींचने वाले तत्वों को समेटने में सफल रहे हैं।
कहां चूक गई ‘धमाल 4’?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और ‘धमाल 4’ भी कमियों से अछूती नहीं है। फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष इसकी घिसे-पिटे और पुराने पड़ चुके चुटकुलों पर निर्भरता है। इंद्र कुमार आज भी कहीं न कहीं 90 के दशक वाले कॉमेडी पैटर्न से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाए हैं, जहां किसी के हकलाने, शारीरिक बनावट या वजन को लेकर मजाक उड़ाने को ही मुख्य हास्य मान लिया जाता था। आज के दौर का सिनेमा और दर्शक काफी बदल चुके हैं, इसलिए ऐसे कुछ दृश्य आपको हंसाने के बजाय थोड़े बोझिल या आउटडेटेड लग सकते हैं।
इसके अलावा, फिल्म का दूसरा हाफ अपनी रफ्तार खो देता है। इंटरवाल के बाद जब पूरी कहानी एडवेंचर, जंगल और ट्रेजर हंट की तरफ मुड़ती है तो फिल्म की कॉमेडी का ग्राफ नीचे गिरने लगता है। जंगल के भीतर के कई चेस सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा लंबे खींचे गए महसूस होते हैं, जिससे फिल्म की लंबाई अखरने लगती है। राइटिंग डिपार्टमेंट ने कुछ भी नया या ग्राउंडब्रेकिंग लिखने का प्रयास नहीं किया है। कहानी इतनी प्रेडिक्टेबल है कि आप पहले से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अगला सीन क्या होने वाला है, कौन सा किरदार क्या गलती करेगा और बैकग्राउंड म्यूजिक कब फनी होने वाला है। क्लाइमैक्स में जो अचानक 10 मिनट का इमोशनल ड्रामा ठूंसा गया है, वह कुछ बड़े दर्शकों को थोड़ा अजीब या फिल्म के मिजाज से अलग लग सकता है, जिसके लिए थियेटर में थोड़े धैर्य की जरूरत पड़ती है।
उम्दा कैमरा वर्क मगर कमजोर विजुअल इफेक्ट्स
तकनीकी नजरिए से देखा जाए तो फिल्म का मिला-जुला रिस्पॉन्स रहता है। सुधीर कुमार चौधरी की सिनेमैटोग्राफी फिल्म का एक मजबूत पक्ष है। उन्होंने आइलैंड, समंदर और जंगल के लोकेशंस को बहुत ही भव्य और खूबसूरती के साथ कैमरे में कैद किया है। फिल्म का स्केल स्क्रीन पर काफी बड़ा और सिनेमामैटिक नजर आता है, जो दर्शकों को एक एडवेंचरस राइड का अहसास कराने में मदद करता है। बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म के मिजाज के अनुकूल है और दृश्यों के कौतुक को बढ़ाने का काम करता है।
हालांकि फिल्म का सबसे कमजोर तकनीकी पहलू इसका वीएफएक्स और स्पेशल इफेक्ट्स हैं। कई दृश्यों में जहां जानवरों (जैसे शेर, मगरमच्छ) या तूफानों का इस्तेमाल किया गया है, वहां ग्रीन स्क्रीन का प्रभाव बहुत ही साफ और नकली नजर आता है। आज के समय में जब दर्शक उच्च स्तर का विजुअल सिनेमा देखने के आदी हो चुके हैं, ऐसे में यह कमजोर वीएफएक्स फिल्म के प्रभाव को थोड़ा कम कर देता है। एडिटिंग की बात करें तो पहले हाफ में यह काफी चुस्त है, लेकिन दूसरे हाफ में इसे थोड़ा और कसा जा सकता था ताकि फिल्म का खिंचाव कम हो सके। संगीत के मामले में इटैलियन गाने ‘बेला चाओ’ का रीमेक और कुछ अन्य गाने जैसे ‘साड़ी’ और ‘चटनी’ थिरकने पर मजबूर करते हैं, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं है जो थियेटर से बाहर निकलने के बाद आपकी जुबान पर लंबे समय तक याद रहे।
अंतिम फैसला और वर्डिक्ट
‘धमाल 4’ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी कमजोरियों और प्रेडिक्टेबल स्क्रीनप्ले के बावजूद केवल अपने कलाकारों के शानदार परफॉर्मेंस, गजब के कॉमिक तालमेल और हल्के-फुल्के पारिवारिक माहौल के दम पर टिकी हुई है। यह फिल्म किसी भी प्रकार के सिनेमाई चमत्कार या बहुत गहरे और समझदारी भरे हास्य का दावा नहीं करती है। यह पूरी तरह से एक पॉपकॉर्न एंटरटेनर है, जिसे देखते समय आपको अपने दिमाग के घोड़ों को पूरी तरह से शांत रखना होगा।
यदि आप ‘धमाल’ सीरीज के पुराने प्रशंसक हैं और आपको बिना लॉजिक वाली सिचुएशनल कॉमेडी फिल्में देखना पसंद है, तो अजय देवगन, अरशद वारसी, जावेद जाफरी और रवि किशन की यह मंडली आपको निराश नहीं करेगी। यह एक परफेक्ट फैमिली एंटरटेनर है जिसे आप सप्ताहांत पर अपने बच्चों और परिवार के साथ थियेटर में जाकर एक बार जरूर देख सकते हैं और कुछ हल्के-फुल्के ठहाकों का आनंद ले सकते हैं।
