‘बेबी डू डाई डू’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। सस्पेंस और थ्रिलर जोनर की फिल्म में हुमा कुरैशी लीड रोल निभा रही हैं। फिल्म में वो बिना बोले ही इंपैक्ट छोड़ती है। फिल्म की कहानी कैसी है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
मसाला फिल्मों और एक ही ढर्रे पर चलने वाली थ्रिलर कहानियों के बीच जब कोई फिल्म अपनी एक अलग पहचान बनाने का जोखिम उठाती है तो सिनेमाप्रेमियों का ध्यान उसकी तरफ जाना लाजिमी है। इस शुक्रवार सिनेमाघरों में रिलीज हुई निर्देशक नचिकेत सामंत की फिल्म ‘बेबी डू डाई डू’ एक ऐसा ही अनूठा प्रयास है। फिल्म का शीर्षक पहली बार सुनने में थोड़ा अजीब और उलझा हुआ लग सकता है, लेकिन कहानी की गहराई में उतरते ही यह पूरी तरह साफ हो जाता है। दरअसल यह नाम फिल्म की मुख्य किरदार ‘बेबी करमरकर’ के नाम से ही उपजा है,’कर, मर, कर’ यानी अंग्रेजी में ‘डू, डाई, डू’। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की पारंपरिक और घिसी-पिटी सीमाओं को तोड़ते हुए एक पल्प फिक्शन और डार्क ह्यूमर से भरपूर दुनिया रचती है, जहां मुख्य किरदार यह मानकर चलता है कि वह किसी भी हद तक जा सकती है, उसके लिए जान दांव पर लगा सकती है और फिर से उठकर खड़ी हो सकती है। 2 घंटे 05 मिनट की यह फिल्म एक ‘ए’ सर्टिफाइड एक्शन-क्राइम-थ्रिलर है, जो मनोरंजन के साथ-साथ एक नया नजरिया पेश करने का माद्दा रखती है।
अतीत के साये और प्रतिशोध की अनोखी दास्तां
फिल्म की कहानी किसी बड़बोलेपन से नहीं, बल्कि एक गहरी खामोशी और बचपन के एक भयानक हादसे से शुरू होती है। कहानी की मुख्य किरदार बेबी बोल और सुन नहीं सकती। बचपन में अपनी जुड़वा बहन के साथ घूमते हुए वह एक खाली पड़े पांच सितारा होटल में चली जाती है, जहां वे दोनों अनजाने में एक खौफनाक मर्डर की गवाह बन जाती हैं। उस बेरहम हत्यारे के हाथों बेबी की जुड़वा बहन का गला घोंटकर कत्ल कर दिया जाता है और बेबी किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से निकलती है। शराबी पिता के साये में पली-बढ़ी बेबी के दिल में उस रात से ही प्रतिशोध की एक ऐसी आग सुलगती है, जो उसे सामान्य जिंदगी से दूर ले जाती है।
बड़ी होकर बेबी सीधे तौर पर पीएम जैन (चंकी पांडे) के संपर्क में आती है, जो उसे सुपारी किलिंग यानी कॉन्ट्रैक्ट किलिंग के अंधेरे और बेरहम साम्राज्य में शामिल कर लेता है। बेबी इस काली दुनिया की सबसे शातिर और अचूक ‘हिटवुमन’ बनकर उभरती है। उसका काम करने का तरीका बेहद अनोखा है; वह हत्याओं के लिए किसी पारंपरिक हथियार के बजाय एक खास किस्म के छाते का इस्तेमाल करती है, जो देखने में जितना साधारण लगता है, काम में उतना ही घातक है। बेबी अपनी शारीरिक अक्षमता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ढाल और ताकत बना लेती है। शहर में एक के बाद एक बड़ी हत्याओं का सिलसिला शुरू हो जाता है और पुलिस महकमे में खलबली मच जाती है, लेकिन इन सबके पीछे बेबी का एकमात्र अंतिम मकसद पेशेवर हत्यारा बने रहना नहीं, बल्कि उस चेहरे को बेनकाब करना और खत्म करना है जिसने बचपन में उसकी बहन की जिंदगी छीनी थी। इसी बीच उसकी जिंदगी में प्यार की दस्तक होती है और कहानी प्रतिशोध के रास्ते से मुड़कर भावना, पहचान और मुक्ति के एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो जाती है।
हुमा कुरैशी और अन्य कलाकारों का अभिनय
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी और रीढ़ की हड्डी हुमा कुरैशी का अभिनय है। बिना एक भी शब्द बोले, सिर्फ अपनी आंखों के उतार-चढ़ाव, चेहरे के हाव-भाव और सधे हुए बॉडी लैंग्वेज के जरिए उन्होंने ‘बेबी’ के किरदार में जान फूंक दी है। हुमा ने पर्दे पर खुद को पूरी तरह से बिना मेकअप के पेश करने का साहस दिखाया है। फिल्म के कई क्लोज-अप शॉट्स में चेहरे की स्वाभाविक रेखाएं और कमियां साफ नजर आती हैं, जो उनके किरदार को और अधिक प्रामाणिक और वास्तविक बनाती हैं। वह एक खूंखार शूटर के रूप में जितनी आक्रामक दिखती हैं, एक संवेदनशील प्रेमिका और अतीत के दर्द से तड़पती बहन के रूप में उतनी ही भावुक नजर आती हैं। यह उनके करियर के सबसे परिपक्व और बेहतरीन प्रदर्शनों में से एक है।
सहयोगी कलाकारों में चंकी पांडे ने सबसे ज्यादा चौंकाया है। अपनी पुरानी कॉमेडी छवि से पूरी तरह उलट उन्होंने पीएम जैन के रूप में एक बेहद शांत, क्रूर और गंभीर सुपारी किलर गिरोह के सरगना के किरदार को बखूबी निभाया है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को एक अलग वजन देती है। वहीं सिकंदर खेर ने एक शातिर और लालची बिल्डर जफर के नकारात्मक किरदार में अपनी एक मजबूत छाप छोड़ी है, उनकी मौजूदगी कहानी के तनाव को और वास्तविक बनाती है।
डीसीपी अंजुम खान के रूप में अनुभवी अभिनेत्री सीमा पाहवा का काम हमेशा की तरह बेहद सहज और असरदार है। उनका एक संवाद कि ‘हम पुलिस हैं, हीरो नहीं’ फिल्म के यथार्थवादी रवैये को दर्शाता है। बेबी के प्रेमी ‘सिद्धू’ के किरदार में रचित सिंह बेहद ईमानदार लगे हैं। उनका किरदार आज के दौर के पारंपरिक हीरो जैसा नहीं है, बल्कि वह खुद को ‘घरेलू’ और नॉन-टॉक्सिक कहने में गर्व महसूस करता है। ब्लैक एंड व्हाइट फ्लैशबैक दृश्यों में उनके और हुमा के बीच का रोमांस फिल्म की हिंसा के बीच एक सुकून भरी गर्माहट पैदा करता है। खून, मौत और दर्द को देख उनके चेहरे पर आने वाले भाव, बेहद संजीदा और गंभीर है, जिसे पर्दे पर देखकर महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा विद्या मालवड़े, हिमांशु मलिक, रूपेश बाने, अरुण कुशवाह और मरुधर शेखावत जैसे कलाकारों ने भी अपने छोटे लेकिन रंगीन किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।
डार्क ह्यूमर, नोआर ट्रीटमेंट और कड़क निर्देशन
निर्देशक नचिकेत सामंत ने एक बेहद ही साहसिक और संवेदनशील विषय को विशुद्ध व्यावसायिक और मनोरंजक सांचे में ढालने की कोशिश की है। उन्होंने मुंबई के क्राइम नेटवर्क को बहुत ज्यादा ग्लैमरस या काल्पनिक दिखाने के बजाय उसे एक संगठित व्यवस्था के रूप में पेश किया है, जहां हिंसा महज एक बिजनेस डील की तरह काम करती है। निर्देशक का डार्क कॉमेडी, सस्पेंस और एक्शन के बीच संतुलन बनाने का प्रयास काफी हद तक सफल रहा है। फिल्म की रफ्तार शुरुआत से ही तेज बनी रहती है, जिससे दर्शक कहीं भी ऊबते नहीं हैं।
तकनीकी तौर पर फिल्म काफी समृद्ध है। टोजो जेवियर की सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म का एक और बड़ा मजबूत पहलू है। उन्होंने मुंबई की बारिश से भीगी सड़कों, तंग गलियों और मद्धम रोशनी वाले कमरों को क्लासिक नोआर सिनेमा की शैली में कैद किया है, जिससे पूरी फिल्म के दौरान एक रहस्यमयी और गंभीर माहौल बना रहता है। मुंबई शहर खुद इस कहानी में एक मूक किरदार की तरह उभरता है। फिल्म की एडिटिंग काफी चुस्त है, जिसके कारण कहानी अनावश्यक रूप से कहीं भी खिंचती नहीं है। एक्शन दृश्यों को बेहद स्टाइलिश ढंग से कोरियोग्राफ किया गया है, खासकर मुंबई लोकल ट्रेन के भीतर फिल्माया गया हत्या का एक सीक्वेंस बेहद डरावना और रोंगटे खड़े कर देने वाला है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत दृश्यों के प्रभाव को दोगुना करते हैं और गानों को कहानी के बीच इस तरह पिरोया गया है कि वे गति में बाधा नहीं बनते। इसके अलावा फिल्म में समकालीन सिनेमा पर कुछ मजेदार कटाक्ष भी हैं, जैसे कि ‘अल्फा’ को लेकर किया गया एक इशारा और साकिब सलीम पर फिल्माया गया एक क्वीर क्लब नंबर ‘अल्फा क्यू’। साथ ही सोनाक्षी सिन्हा से जुड़ा एक ईस्टर एग भी फिल्म में स्मार्टली जोड़ा गया है।
कहां चूक गई ‘बेबी’?
इतनी सारी खूबियों के बावजूद ‘बेबी डू डाई डू’ चंद कमिया ही हैं। पहला हाफ में काफी कुछ बिल्ड किया जा रहा है, जिसमें बेबी के सामने आने वाली चुनौतिया काफी देर में स्टैब्लिश की गई है, जो थोड़ा बोर कर सकता है, लेकिन वही 10 से 12 वक्त अगर आप कुर्सी पर डट कर बैठे रह जाते हैं तो कहानी आगे कहीं भी आपको निराश नहीं करती। इतना ही नहीं फिल्म ऐसे मोड़ पर खत्म होती है कि पार्ट 2 की गुंजाइश अभी बाकी है, अगर ये मोड़ न भी दिया जाता तो ठीक रहता है, क्यों जिस वजह के चलते बेबी अपराधी बनी थी, जिसका वो बदला लेना चाहती है, उसे पूरा कर लिया है, ऐसे में दूसरे भाग में उसके पास कोई पर्सनल मकसद नहीं होगा, वो सिर्फ वारदातों को इसलिए अंजाम देगी, क्योंकि जुर्म की दुनिया में एंट्री तो होती है, लेकिन कोई वापसी नहीं है। ये सिर्फ एक व्यावसायिक कोशिश लग रही है।
फिल्म की खास बातें?
फिल्म में पल-पल सस्पेंस गहराता है और आखिर तक सस्पेंस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। परत दर परत सस्पेंस दूसरे हाल्फ में खुलता है। फिल्म का दूसरा हाल्फ काफी कसा और ट्विस्ट से भरा है। क्लाइमेक्स फिल्म का सबसे जानदार है, जो आपको दिमाग हिला सकता है और ये फीलिंग आएगी कि ये तो हमने सोचा ही नहीं था। कैमरा वर्क शानदार है, पानी की टपकती बूंद से लेकर लॉन्ग शॉट्स कमाल के लिए गए हैं।
अंतिम फैसला
‘बेबी डू डाई डू’ कमियों के बावजूद एक बेहद ईमानदार, साहसिक और मनोरंजक थ्रिलर फिल्म है। इस फिल्म का सबसे बड़ा महत्व यह भी है कि ऐसे दौर में जब महिला-प्रधान एक्शन फिल्मों को अक्सर सीधे ओटीटी पर रिलीज कर दिया जाता है, इसके निर्माताओं (साकिब सलीम) ने इसे थियेटर्स में रिलीज करने का भरोसा दिखाया। यह फिल्म साबित करती है कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में आज भी नए विचारों और प्रयोगों के लिए जगह बची हुई है। अगर आप पारंपरिक और घिसी-पिटी मसाला फिल्मों से हटकर कुछ नया, स्टाइलिश, थोड़ा डार्क और सस्पेंस से भरपूर सिनेमा देखने के शौकीन हैं, तो हुमा कुरैशी के इस मूक लेकिन बेहद धमाकेदार अवतार को देखने सिनेमाघर जरूर जाएं। यह फिल्म निश्चित रूप से आपकी वॉचलिस्ट में शामिल होने की हकदार है।
