आजमगढ़। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के थाना कप्तानगंज क्षेत्र स्थित ग्राम चेहवता से पारिवारिक विवाद और कथित संपत्ति हड़पने का एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। गांव निवासी करीब 74 वर्षीय मुक्तिनाथ यादव ने अपने ही बेटों, बहुओं और परिवार के अन्य लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि पिछले लगभग 18 वर्षों से लगातार मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। आरोप है कि उम्र के इस अंतिम पड़ाव में उन्हें अपने ही घर से बेदखल कर दिया गया, जिसके कारण आज वह दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
मुक्तिनाथ यादव का आरोप है कि उनके बड़े बेटे राजेश यादव, बहू संगीता यादव, छोटे बेटे बृजेश यादव, बहू पूनम यादव तथा परिवार के अन्य लोगों ने उन्हें उनके ही घर से अलग कर दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत और कमाई से ग्राम चेहवता में मकान और जमीन तैयार की थी, लेकिन अब उसी घर में उन्हें रहने तक नहीं दिया जा रहा। कई बार उन्होंने परिवार से केवल एक कमरा रहने के लिए देने की गुहार लगाई, लेकिन उनकी मांग को भी ठुकरा दिया गया।
मुक्तिनाथ यादव का कहना है कि उनके नाम दर्ज लगभग 12 बिस्वा से अधिक तथा उनकी दिवंगत पत्नी के नाम दर्ज लगभग 6 बिस्वा से अधिक जमीन बिना उनकी जानकारी के बेटों ने अपने नाम करा ली। उनका आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी तक उन्हें नहीं दी गई। इतना ही नहीं, उनका कहना है कि उनकी बेटी कंचन भी अपने भाइयों के पक्ष में खड़ी है, जिससे उन्हें परिवार में किसी का सहयोग नहीं मिल रहा।
पीड़ित के अनुसार उनका बड़ा बेटा राजेश यादव पुलिस विभाग में कार्यरत है, जबकि बहू संगीता यादव सफाई कर्मचारी है। उनका आरोप है कि पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्हें लगातार दबाव में रखा जाता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बहू के परिचित प्रकाश नामक व्यक्ति अक्सर उनके घर में रहता है और पूरे मामले में हस्तक्षेप करता है, जिससे उनका मानसिक उत्पीड़न और बढ़ गया है।
मुक्तिनाथ यादव का कहना है कि उन्होंने करीब 50 वर्षों तक दिल्ली में मेहनत-मजदूरी और नौकरी कर परिवार का पालन-पोषण किया। जब-जब परिवार में विवाद बढ़ा, वह दिल्ली जाकर काम करने लगे। लेकिन अब बढ़ती उम्र और शारीरिक कमजोरी के कारण वह काम करने की स्थिति में नहीं हैं। उनका आरोप है कि वर्ष 2026 में उनकी उम्र और असहाय स्थिति को देखते हुए प्रताड़ना और बढ़ गई है। बेटा-बहू लगातार उनसे कहते हैं कि “काम करके कमाओ, नहीं तो यहां से चले जाओ।” पीड़ित का कहना है कि 74 वर्ष की उम्र में उनके लिए मेहनत-मजदूरी करना संभव नहीं है, फिर भी उन्हें अपमानित किया जाता है और घर में रहने का अधिकार भी नहीं दिया जा रहा।
उनका कहना है कि वर्तमान में वह रिश्तेदारों और परिचितों के यहां शरण लेकर किसी तरह जीवन बिता रहे हैं। कभी एक रिश्तेदार तो कभी दूसरे परिचित के यहां रात गुजारनी पड़ती है। उनका आरोप है कि यदि वह अपने घर जाने का प्रयास करते हैं तो उन्हें झूठे मुकदमों, छेड़छाड़ के आरोपों और जान से मारने की धमकियां देकर डराया जाता है।
पीड़ित ने बताया कि उन्होंने कई बार स्थानीय पुलिस, प्रशासन और आईजीआरएस पोर्टल के माध्यम से शिकायतें कीं। पुलिस ने मामले की जांच के बाद इसे पारिवारिक विवाद बताते हुए दोनों पक्षों के विरुद्ध शांति भंग की आशंका में बीएनएसएस की धारा 126/135 के तहत कार्रवाई की। हालांकि, पुलिस जांच में अन्य आरोपों की पुष्टि नहीं होने की बात कही गई। इसके बावजूद मुक्तिनाथ यादव का कहना है कि उनकी मूल समस्याओं का समाधान आज तक नहीं हो सका। उनका कहना है कि उन्हें न तो रहने के लिए घर मिला और न ही अपनी पैतृक संपत्ति में अधिकार।
मुक्तिनाथ यादव ने जिला प्रशासन, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों तथा संबंधित विभागों से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए, उनकी संपत्ति और मकान में उनका वैधानिक अधिकार दिलाया जाए तथा वृद्धावस्था में उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर उपलब्ध कराया जाए। यदि पीड़ित के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल पारिवारिक विवाद नहीं बल्कि एक बुजुर्ग नागरिक के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सामाजिक प्रश्न भी बन जाता है। वहीं, इस मामले में जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष सामने आना अभी बाकी है।