संजीव सान्याल ने रायसीना डायलॉग में कहा कि भारत को इंडो-पैसिफिक में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए समुद्री चेतना बढ़ानी होगी। उन्होंने बताया कि भारत का समुद्री क्षेत्र जमीन से लगभग 70% बड़ा है और प्राचीन समुद्री परंपराओं व तकनीक को फिर से अपनाने की जरूरत है।नई दिल्ली: रायसीना डायलॉग 2026 में भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती भूमिका और ‘समुद्री चेतना’ या समुद्र से जुड़ी समझ को मजबूत करने की जरूरत पर गहन चर्चा हुई। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और पॉलिसी एक्सपर्ट गौतम चिकरमाने ने इस सत्र में भारत की नौसैनिक रणनीति, तकनीकी क्षमताओं और क्षेत्र में बदलते सुरक्षा परिदृश्य पर बात की। दोनों के बीच चर्चा से साफ हुआ कि वैश्विक व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय भू-राजनीति के समुद्र की ओर बढ़ते रुझान के बीच भारत के लिए समुद्री शक्ति कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
‘प्राचीन समुद्री परंपराओं से फिर जुड़ना चाहिए’
संजीव सान्याल ने रायसीना डायलॉग में कहा कि भारत को मजबूत ‘समुद्री चेतना’ (maritime consciousness) विकसित करनी होगी। उन्होंने बताया कि लंबी तटररेखा और समृद्ध समुद्री इतिहास के बावजूद भारत का ध्यान हमेशा जमीन पर आधारित कहानियों पर ज्यादा रहा है। भारतीय इतिहास और रणनीतिक सोच में ज्यादातर जमीन पर होने वाले संघर्षों और साम्राज्यों की बात होती है, जबकि समुद्री गतिविधियों को कम महत्व मिला। सान्याल ने जोर देकर कहा कि भारत को अपनी प्राचीन समुद्री परंपराओं से फिर जुड़ना चाहिए और उन्हें आधुनिक तकनीक व रणनीति के साथ जोड़कर इंडो-पैसिफिक में अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए।
भारत के समुद्री क्षेत्र पर सान्याल ने कही अहम बात
सान्याल ने एक महत्वपूर्ण बात बताई जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है, और वह है कि भारत का समुद्री क्षेत्र कितना बड़ा है। उन्होंने कहा,’भारत के पास इतिहास और बहुत लंबी तटररेखा होने के बावजूद हाल तक समुद्री चेतना नहीं थी। हमारे इतिहास की किताबों में ब्रिटिश आने तक ज्यादातर जमीन से जुड़ी बातें ही हैं। अगर भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) को देखें, जो समुद्री क्षेत्र है, तो वास्तव में भारत का आकार उसके जमीन के क्षेत्रफल से 70 प्रतिशत बड़ा हो जाता है। यानी भारत का समुद्री क्षेत्र उसके लैंड एरिया से 70 प्रतिशत बड़ा है।’
‘INSV कौंडिन्य ने बताई प्रचीन भारत की क्षमता’
सान्याल ने भारत की ऐतिहासिक समुद्री क्षमताओं को दिखाने वाले एक रोचक प्रोजेक्ट का जिक्र किया। उन्होंने INSV कौंडिन्य नामक जहाज के बारे में बताया, जो चौथी शताब्दी ईस्वी की तकनीक से बनाया गया है। यह जहाज लकड़ी के तख्तों को रस्सी से सिलकर बनाया गया है, ठीक वैसे ही जैसे 1600 साल पहले इस्तेमाल होता था। इस जहाज की क्षमता जांचने के लिए गुजरात से ओमान तक सफर किया गया, जो लगभग 17 दिनों में पूरा हुआ। इस यात्रा से साबित हुआ कि प्राचीन भारतीय जहाज निर्माण तकनीक लंबी समुद्री यात्राओं के लिए सक्षम थी।
सान्याल ने कहा, ‘INSV कौंडिन्य असल में चौथी शताब्दी ईस्वी के सिद्धांतों पर बना जहाज है, यानी 1600 साल पुरानी तकनीक। इसे तख्तों को रस्सी से सिलकर बनाया गया है और सिर्फ उस समय उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। आप बैकग्राउंड में इसकी कुछ तस्वीरें देख सकते हैं। हमने जहाज बनाने में कुछ साल लगाए और फिर दिसंबर-जनवरी में गुजरात से ओमान तक 17 दिनों में सफर पूरा किया, ताकि दिखाया जा सके कि ऐसे जहाज इन यात्राओं के लिए सक्षम थे।’

