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मधुबनी में कानून के आदेश बेअसर? 82 CrPC के बावजूद आरोपी खुलेआम, महिला बोली—घर तोड़ा, बेटे के अपहरण की धमकी, पुलिस ने नहीं की गिरफ्तारी

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मधुबनी।
जिले के जयनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत गोवराही गांव से एक बार फिर कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला सनसनीखेज मामला सामने आया है। पीड़िता संगीता देवी (32 वर्ष), पत्नी विनोद यादव, का आरोप है कि न्यायालय के स्पष्ट आदेश और धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता (कुर्की-जब्ती) जारी होने के बावजूद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर रही है।

पीड़िता के अनुसार, उनका मामला अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी, जयनगर के न्यायालय में विचाराधीन है। इस मामले में दिनांक 20 दिसंबर 2025 को न्यायालय ने अभियुक्त मनोज यादव और भोली देवी के विरुद्ध धारा 82 CrPC के तहत पूर्वी कुर्की-जब्ती का आदेश जारी किया था, जिसे संबंधित थाना जयनगर को भी भेजा गया। इसके बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की गई।

संगीता देवी का आरोप है कि 25 अक्टूबर 2025 की शाम करीब 7 बजे उनके दियाद मनोज यादव, विमा देवी, भोली देवी और हनुमान यादव ने मिलकर उनका घर तोड़ दिया और घर का सारा सामान लूटकर ले गए। इसके बाद से वह अपने पति के साथ मायके कलिकापुर (थाना कलुआही) में रहने को मजबूर हैं। पीड़िता का कहना है कि आरोपी लगातार जान से मारने की धमकी दे रहे हैं और गांव में रहने नहीं दे रहे।

मामले को और गंभीर बनाते हुए संगीता देवी ने बताया कि आरोपियों द्वारा उनके 12 वर्षीय बेटे कृष्ण कुमार के अपहरण की धमकी भी दी जा रही है। इस कारण पूरा परिवार भय और तनाव के माहौल में जी रहा है। पीड़िता का कहना है कि बच्चे की सुरक्षा को लेकर वह हर पल डरी हुई हैं।

सबसे गंभीर आरोप पुलिस की भूमिका को लेकर है। संगीता देवी का कहना है कि आरोपी जयनगर थाना क्षेत्र में ही रहते हैं, इसके बावजूद थाना प्रभारी कथित रूप से उनके प्रभाव में आकर गिरफ्तारी से बच रहे हैं। गिरफ्तारी न होने के कारण मुकदमा आगे नहीं बढ़ पा रहा है और न्याय मिलने में लगातार देरी हो रही है।

पीड़िता ने कई बार थाना, अधिकारियों और अन्य मंचों पर आवेदन दिया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि पुलिस की निष्क्रियता ने आरोपियों का मनोबल बढ़ा दिया है और वे खुलेआम धमकियां दे रहे हैं।

संगीता देवी ने प्रशासन से मांग की है कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए मनोज यादव और भोली देवी को अविलंब गिरफ्तार किया जाए, ताकि उन्हें और उनके बेटे को सुरक्षा मिल सके और मुकदमा आगे बढ़ सके।

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि जब कोर्ट के आदेश भी जमीन पर लागू न हों, तो पीड़ित आखिर किससे न्याय की उम्मीद करे? क्या कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है?

 

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