विशेष संवाददाता कंचन की रिपोर्ट
लखीसराय। बिहार के लखीसराय जिले के एक मजदूर की संघर्षभरी कहानी एक बार फिर रोजगार के सवाल को सामने लेकर आई है। जिले के देहरा गांव निवासी नॉलेज कुमार का कहना है कि वह महज 15 साल की उम्र में रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई चला गया था। आज करीब 25 साल बीत चुके हैं, लेकिन परिस्थितियां ऐसी हैं कि अब भी परिवार का पेट पालने के लिए परदेस में मजदूरी करने को मजबूर है। उसका कहना है कि यदि बिहार में ही रोजगार के पर्याप्त अवसर होते तो उसे अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरे राज्य में जीवन बिताने की मजबूरी नहीं होती।
नॉलेज कुमार ने बताया कि उनके पिता प्यारे यादव मजदूरी के साथ-साथ राजमिस्त्री का काम और खेती-बाड़ी कर परिवार का पालन-पोषण करते रहे, जबकि उनकी मां विमली देवी गृहिणी हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण बचपन में ही उन्हें पढ़ाई और अपने सपनों से समझौता करना पड़ा। परिवार की जिम्मेदारियां उठाने के लिए उन्होंने कम उम्र में ही मुंबई का रुख किया, जहां आज भी धागा बनाने वाली फैक्ट्री में मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वर्षों से मशीनों के बीच लगातार काम करते-करते जिंदगी का बड़ा हिस्सा बीत गया। त्योहार, परिवार की खुशियां और गांव का सुकून सब पीछे छूट गया, लेकिन रोजगार की मजबूरी ने उन्हें कभी वापस लौटने का मौका नहीं दिया। उनका कहना है कि आज भी दिल यही चाहता है कि अपने राज्य में रहकर काम करें, लेकिन रोजगार के अभाव में हर बार मुंबई लौटना पड़ता है।
नॉलेज कुमार ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि बिहार में उद्योगों और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं ताकि युवाओं को अपने घर और परिवार से दूर जाकर मजदूरी करने के लिए मजबूर न होना पड़े। उनका मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध हो तो लाखों युवाओं का पलायन रुक सकता है और वे अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकेंगे।
नॉलेज कुमार की यह कहानी केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि उन लाखों प्रवासी मजदूरों की हकीकत भी बयां करती है, जो बेहतर रोजगार की तलाश में वर्षों से अपने गांव और परिवार से दूर रहकर कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजार रहे हैं।
