“सुधर चुके लुटेरे या फिर बेबस नागरिक?” — सोशल मीडिया पर मदद की गुहार लगाकर बोले बब्बल, ‘अब बदल चुके हैं, लेकिन पुलिस नहीं बदलने दे रही’

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खैर (अलीगढ़): थाना खैर क्षेत्र में कभी ‘लूटपाट’ और ‘चैन स्नैचिंग’ के मामलों में कुख्यात रहे कुछ नाम अब एक नई वजह से चर्चा में हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम है बब्बल पुत्र पूर्ण सिंह, जो अब सोशल मीडिया के ज़रिए योगी सरकार और पुलिस प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं।

बब्बल ने अपने संदेश में कहा —

“हम इस दलदल से निकल चुके हैं, अब सामान्य जीवन जीना चाहते हैं, लेकिन पुलिस हमें बदलने नहीं दे रही। जो मेरे ऊपर पर्चा हुआ है, उससे मुझे बचाया जाए। मैं अब मेहनत से जीवन यापन कर रहा हूं।”

अतीत की छाया से निकलने की जद्दोजहद

बब्बल, जो कभी गलत संगत और नशे की लत में फंस गए थे, अब ईमानदारी से मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। उनका कहना है —

“हमसे पहले गलतियाँ जरूर हुईं, लेकिन अब हम अपने बच्चों का पेट मेहनत से भर रहे हैं। पुलिस हमें बार-बार थाने बुलाकर परेशान करती है, जिससे समाज में फिर बदनाम होना पड़ता है।”

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, बब्बल और उनके जैसे अन्य युवक अब सुधार की राह पर हैं। कोई रिक्शा चला रहा है, कोई खेतों में मेहनत कर रहा है, तो कोई छोटे-मोटे काम कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है।
गांववालों का कहना है कि पिछले कई महीनों से इन लोगों पर कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ है, बावजूद इसके पुलिस लगातार पुराने मामलों का हवाला देकर उन्हें निशाने पर ले रही है।पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल

हाल ही में पुलिस ने जिन पुराने आरोपियों के खिलाफ पोस्टर और बैनर लगवाए, उनमें बब्बल का नाम भी शामिल है। इस कदम पर ग्रामीणों में नाराज़गी है।
एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा —

“अगर कोई चोर से मजदूर बन गया है, तो पुलिस को उसके सुधार का सम्मान करना चाहिए, न कि उसे फिर से अपराधी की तरह पेश करना।”

ग्रामीणों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति बदलना चाहता है, तो उसे समाज में दोबारा स्थान दिया जाना चाहिए। पुलिस द्वारा बार-बार पुरानी फाइलें खोलना ऐसे लोगों को फिर से अपराध की ओर धकेल सकता है।

सरकार और प्रशासन से अपील

बब्बल और उनके साथियों ने शासन और पुलिस प्रशासन से कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं —

जिन व्यक्तियों पर कोई नया अपराध दर्ज नहीं है, उन्हें बेवजह परेशान न किया जाए।

सुधार चुके लोगों को पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की दिशा में सहयोग दिया जाए।

पुलिस रिकॉर्ड में नाम दर्ज रहने के कारण जो लोग काम या रोज़गार से वंचित हैं, उन्हें न्याय और अवसर मिलना चाहिए।

विशेषज्ञों की राय

समाजशास्त्रियों का कहना है कि कानून का उद्देश्य केवल सज़ा देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है।

“अगर कोई व्यक्ति सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो समाज और पुलिस दोनों की ज़िम्मेदारी है कि उसे दोबारा सामान्य जीवन जीने में मदद मिले। उसे अवसर दिया जाना चाहिए, न कि अपमानित किया जाए।”

निष्कर्ष

थाना खैर क्षेत्र की यह कहानी केवल बब्बल पुत्र पूर्ण सिंह की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं की है जिन्होंने कभी गलती की, लेकिन अब जीवन को नई दिशा देने की कोशिश में हैं।
सवाल यह है —
क्या समाज और पुलिस उन्हें सुधार का वास्तविक मौका देंगे? या फिर ये “सुधरे हुए लुटेरे” अपनी नई पहचान बनाने की लड़ाई में हमेशा “पुराने आरोपी” बनकर रह जाएंगे?

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