बकरीद क्या है और क्यों मनाई जाती है? जानें इससे अर्थव्यवस्था में कितना होता है योगदान

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बकरीद की कहानी करीब 2000 ईसा पूर्व से शुरू होती है और आज भी इसे बड़ी धूम-धाम से दुनियाभर के मुसलमान मनाते हैं। जानिए इसकी पूरी कहानी क्या है और यह कैसे देश की इकोनॉमी में योगदान करती है।बकरीद, दुनियाभर के मुसलमानों का एक बड़ा त्योहार है। भारत के मुसलमान भी बकरीद बड़े उत्साह के साथ मनाते आए हैं। इस्लामी कैलेंडर का आखिरी महीना कुर्बानी का महीना कहा जाता है, इसे ज़िल-हिज्जा के नाम से जाना जाता है और ज़िल-हिज्जा की 10 तारीख को पूरी दुनिया के मुसलमान ईद-उल-अज़हा का त्योहार मनाते हैं। ईद का शाब्दिक अर्थ खुशी है, जबकि अज़हा का अर्थ कुर्बानी बलिदान से है। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में बकरीद नाम ज्यादा चलन में है जिसे आमतौर से बकरे वाली ईद के तौर पर जानते हैं। इसमें मुसलमान बकरे की कुर्बानी देते हैं, लेकिन जानकार इसे अरबी के शब्द बक़र और ईद से मिलकर बने हुए एक शब्द का बिगड़ा हुआ रूप भी मानते हैं।पैगंबर इब्राहिम और उनके बेटे से हुई बकरीद की शुरुआत
इस्लाम की मान्यता के मुताबिक, करीब 2000 ईसा पूर्व में ईश्वर के दूत पैगंबर इब्राहिम कई दिनों तक एक ख्वाब देखते हैं कि वो ईश्वर की राह में अपने इकलौते बेटे की कुर्बानी दे रहे हैं। पैगंबर इब्राहिम को ये बेटा 80 वर्ष से ज्यादा उम्र के बाद मिला था। पैगंबर इब्राहिम सपने की बात अपने बेटे इस्माइल से बताते हैं। बेटा पिता से ईश्वर के आदेश पर अमल करने के लिए अपनी मर्जी देता है। इस तरह पिता पुत्र कुर्बानी के लिए निकल पड़ते हैं।

बकरीद का संदेश ईश्वर पर अटूट भरोसा और त्याग
हज़रत इब्राहिम अपनी समझ से बेटे इस्माइल की गर्दन पर छुरी भी चला देते हैं, लेकिन ईश्वर की तरफ से बेटे की जगह एक जानवर भेज दिया जाता है और वो ज़िबह हो जाता है। बकरीद का सबसे बड़ा संदेश ईश्वर पर अटूट भरोसा और त्याग है। कुर्बानी के गोश्त को गरीबों और जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए कहा गया है जो इस्लाम में ज़कात और खुम्स की तरह चैरिटी का संदेश देता है।

बकरीद और अर्थव्यवस्था
हर सक्षम मुसलमान बकरीद पर कुर्बानी देता है। लेकिन कुर्बानी हर मुसलमान के लिए नमाज़ की तरह जरूरी नहीं है। भारत में करीब 20 करोड़ मुसलमान आबाद हैं लेकिन कुर्बानी को लेकर कोई सटीक आंकड़ा नहीं मिलता। हालांकि, एक अनुमान के मुताबिक बकरीद पर करीब 1.5 करोड़ जानवरों की कुर्बानी होती है। आर्थिक तौर पर मजबूत लोग कई जानवरों की कुर्बानी देते हैं तो गरीब मुसलमान एक बड़े जानवर की कुर्बानी में हिस्सा लेकर भी त्योहार मनाते हैं। इन जानवरों की कीमत अलग-अलग होती है। इस साल सबसे महंगे बिकने वाले बकरे की कीमत करीब 4 करोड़ बताई जा रही है जिसके शरीर पर कोई खास निशान था।

करीब 50 हजार करोड़ तक बकरीद पर होता है कारोबार
भारत की कई मंडियों में बकरों की कीमत 50 लाख तक गई। ये बकरे विदेशी नस्ल के बड़े डील-डौल वाले भारी-भरकम खूबसूरत बकरे थे। वडोदरा में चांद नाम के एक बकरे लिए 31 लाख की कीमत का दावा किया गया। महाराष्ट्र के एक किसान ने क्रेसेंट नाम के एक बकरे की कीमत 15 लाख रुपये रखी थी। इस तरह के बड़ी रकम वाले बकरे महंगी नस्ल के 100 से 150 किलो वजन वाले होते हैं। माना जाता है कि सिर्फ बकरीद के मौके पर जानवरों से जुड़ा कारोबार करीब 50 हजार करोड़ तक पहुंच जाता है। एक जानवर की बिक्री से कई लोगों की कमाई जुड़ी होती है। इसमें चारा बेचने वाला, वेटनरी डॉक्टर, कारोबारी, ट्रांसपोर्टर, मजदूर, कसाई और चमड़ा कारोबारी शामिल हैं।

यूपी में यादव तो गुजरात में मालधारी पशुपालन में आगे
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और बिहार जैसे राज्य पशुपालन में अच्छा कर रहे है। यूपी में यादव, गुर्जर और छोटे किसान पशुपालन से बड़ी संख्या में जुड़े हैं। राजस्थान में रबारी, रायका और मालधारी से समुदाय पारंपरिक तौर पर पशुपालन से जुड़े हुए हैं। राजस्थान के सूखे हिस्सों में तो किसानों के लिए पशुपालन रोजगार का अहम सोर्स है। गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र में भी मालधारी समुदाय पशुपालन उद्योग से जुड़ा है।

तेजी से फल-फूल रहा गोट फॉर्मिंग का कारोबार
देश के बाकी राज्यों में भी गोट फॉर्मिंग का कारोबार भी काफी फल-फूल रहा है। आमतौर से भारत में सभी समुदाय के लोग पशुपालन से जुड़े हैं। लेकिन ग्रामीण इलाकों में छोटे किसान, पिछड़े वर्ग, दलित समाज और आदिवासी लोग पशुपालन पर ज्यादा निर्भर करते हैं। इस तरह बकरीद से सभी धर्मों और समुदायों के लोग परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुड़ते हैं।

सालभर चलती रहती हैं बकरीद से जुड़ी गतिविधियां
वैसे तो बकरीद एक दिन मनाई जाती है लेकिन कुर्बानी का सिलसिला कई दिनों तक चलता है। मगर मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि बकरीद से जुड़ी गतिविधियां सालभर बगैर रुके चलती रहती हैं। लाखों किसान और पशुपालक सालभर बकरा भेड़ और दूसरे जानवर पालते हैं। इस तरह बकरीद, भारत की अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका निभाती है।

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