फरीदाबाद/नोएडा। औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले एक मजदूर के साथ कथित अन्याय और शोषण का मामला सामने आया है, जिसने श्रमिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगभग 10 वर्षों तक एक निजी कंपनी में कार्यरत रहे दिलीप कुमार आज न केवल बेरोजगार हैं, बल्कि अपने हक और इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
पीड़ित दिलीप कुमार, पुत्र कमलेश सिंह, वर्तमान में झाड़सेंटली, फरीदाबाद के निवासी हैं। उनका आरोप है कि वह वर्ष 2016 से विकटोरा इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड (Vitora Engineers Pvt. Ltd.), सेक्टर-58 स्थित प्लॉट नंबर 1136 में ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थे। कोरोना काल के दौरान कंपनी में काम करते समय एक गंभीर हादसे में उनके दाहिने हाथ की चार उंगलियां कट गईं, जिससे उनका जीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया। आरोप है कि इतने बड़े हादसे के बावजूद कंपनी ने उन्हें मात्र 11 हजार रुपये देकर मामले को खत्म करने की कोशिश की।
दिलीप का कहना है कि फरवरी 2025 में कंपनी में काम के दौरान एक और हादसा हुआ, जिसमें उनके सिर पर गंभीर चोट आई और काफी खून बह गया। उन्हें इलाज के लिए सेक्टर-55 स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने एक महीने के बेड रेस्ट की सलाह दी। लेकिन आरोप है कि इस दौरान कंपनी की ओर से न तो ईएसआई सुविधा दी गई और न ही इलाज का कोई खर्च उठाया गया।

दिलीप कुमार का यह भी कहना है कि उन्होंने इस पूरे मामले की शिकायत सेक्टर-58 थाने में दी, लेकिन वहां भी उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री को भी प्रार्थना पत्र भेजकर न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि उन्हें न तो दुर्घटना का उचित मुआवजा मिला, न ही वेतन और न ही किसी प्रकार की पुनर्वास सहायता।
आज हालत यह है कि दिलीप कुमार दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह अपना और अपने परिवार का गुजारा कर रहे हैं। उनकी पत्नी रिंकी देवी और 11 वर्षीय बेटा हरिओम कुमार भी इस आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। परिवार मूल रूप से बिहार के नवाड़ी क्षेत्र का रहने वाला बताया जा रहा है और वर्तमान में बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहा है।
पीड़ित ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, कंपनी के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो, उन्हें उचित मुआवजा, बकाया वेतन और स्थायी नौकरी दिलाई जाए। यह मामला न केवल एक मजदूर के शोषण की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक किस तरह सुरक्षा और अधिकारों के अभाव में जीवन जीने को मजबूर हैं।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले में क्या कदम उठाता है और क्या दिलीप कुमार को समय रहते न्याय मिल पाता है या नहीं।